दीदार

-दीदार-
गजल

तरस गई है आंखे तेरा,करने को दीदार।
घेर लिए हम कांटो ने,रूठ गई बहार।
बिजली बनकर तन्हाई,जला रही है दिल को।
अकेला कब से तड़प रहा हूं,खोज रहा महफ़िल को।
फूलों भरे दिल के गुलशन से,निकल रहे अंगार।
तरस गई है आंखे तेरा,करने को दीदार।

कदम-कदम पर शोले हैं,कोई फूल नजर नहीं आता है।
रखूं जहां क़दमों को,आग सफ़र बन जाता है।
अंधेरों में बस हमारी जिंदगी, चारों तरफ उजाले हैं।
थक चुका हूं चलते-चलते,पांव में बस छाले हैं।
राख मिलेगी ईस दिल में,तुझे नहीं मिलेगा प्यार।
तरस गई है आंखे तेरा,करने को दीदार।
घेर लिए हम कांटो ने,रूठ गई बहार।

ढूंढ रहा हूं गली-गली, मैं तुझको तेरी तस्वीर लिए।
आंखों में अश्क लेके,यादों की जंजीर लिए।
यकीन नहीं आता मुझको,तू कर गई बर्बाद।
मन्दिर मस्जिद जा-जा के, मैं करता हूं फ़रियाद।
पागल मन ये माने नहीं,तू निकलेगी गद्दार।
तरस गई है आंखे तेरा,करने को दीदार।
घेर लिए हम कांटो ने,रूठ गई बहार।

तेरी झलक से जी जाऊंगा, मैं वो जिंदा लाश हूं।
आंखो के तू अश्क पिया जा, मैं चाहत की प्यास हूं।
समझ रही जो हमको तू,इतना मैं बदनाम नहीं।
घूम लिया मैं इस दुनियां में,दिल को कहीं आराम नहीं।
तेरा चुप रहना हमको,जाएगा मार।
तरस गई है आंखे तेरा,करने को दीदार।
घेर लिए हम कांटो ने,रूठ गई बहार।

टूट गया दिल कांच बनकर,हुस्न की ऐसी मार पड़ी।
मिलने हमको जो देती नहीं,ये नफरत की दीवार खड़ी।
छोड़ गई तू साथ हमारा,प्यार नहीं निभाना था।
मीठी बांतें करती थी,वो तो तेरा बहाना था।
बस दे गई हमको,ये दर्द का व्यापार।
तरस गई है आंखे तेरा,करने को दीदार।
घेर लिए हम कांटो ने,रूठ गई बहार।

Birendar Singh Athwal

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मां की दुआ

मां की दुआ
कविता

अ-मां ये जिंदगी क्या,सारे जन्म तेरे नाम कर दूं।
तुझपे कुर्बान अपनी ये, जान कर दूं।
हमें पालने के लिए मां कितनी,आपने उठाई है परेशानी।
तेरे चरणों को धोकर, मां,में पिलूं वो पानी।

कभी बहने न दूंगा,मां तेरी आंखों से अश्क।
मां तू कहे तो चुरा लाऊं चमन से, फूलों की मुश्क।
मां तेरी सूरत जब देखूं,मन को मिलती है ठंडक।
सारे जहां की तुझमें,मां छुपी है रंगत।

मां तेरे चरणों को छूने से,दिल को मिलती है तसल्ली।
तेरे आगे फीकी मां,लगती है दिल्ली।
मां तू कहे तो अंगारों में,जल जाऊं।
तेरी ममता के सागर में डूबकर, किनारों को भूल जाऊं।

जाना छोड़ दूं मन्दिर मस्जिद,एक बार तू कह दे ए मां।
पीछे कदम हटेंगे नहीं,ये हमारी है जुबां।
मां तेरे क़दमों में झुका दूं,सारी दुनियां की खुशी।
चांद-सितारों को बना दूं,तेरे होंठो
की हंसी।

मां तुझमें कितनी है ममता,ये दुवाओं का पिटारा।
मां तेरे सामने ये दुनियां,लगती है खट्टारा।
जीत लूंगा दुनियां की हर जंग,मगर मां तेरी नफरत के आगे हार जाऊंगा।
उतार दूंगा कर्ज मैं दुनिया का,मगर मां तेरा कर्ज कभी न उतार पाऊंगा।

Birendar Singh Athwal

मेंहदी दोबारा

मेंहदी दोबारा
-गजल

तूने मेंहदी दोबारा, कैसे रचाई नाजुक
हाथों में।
तोड़कर सात फेरों का बंधन,आ गई तू गेरों की बातों में।
तूने केसे भुलाए वो रिश्ते नाते,जो सात फेरे लिए थे।
वो गलियां वो आंगन,वो खुशियों के उजाले सब तेरे लिए थे।
तेरे बदन की खुशबू अभी तक है जिंदा,हमारी सांसों में।
तूने मेंहदी दोबारा कैसे रचाई, नाजुक
हाथों में।

मेरे अपनों ने ही, गेर तुझको बनाया।
गैरों की राहों में,मेरे दिल के चमन का फूल खिलाया।
सोचता हूं जमाने में धोखेबाज, क्यों अपने होते हैं।
दौलत के सिवाय न कोई,उनके सपने होते हैं।
देकर दर्द अपने ही, छोड़ जाते हैं गम की सलाखों में।
तूने मेंहदी दोबारा कैसे रचाई,नाजुक
हाथों में।
तोड़कर सात फेरों का बंधन,आ गई तू गेरो की बांतों में।

तेरे घूंघट में सितारे मेरी वफ़ा के, नजर आते हैं जमाने को।
पहनकर शादी का जोड़ा,भूल गई तू तेरे दीवाने को।
बांधकर शेहरा,तेरे दर पे आया था।
खुशियों के नजारे, चुन -चुन कर लाया था।
तूने क्यों घोला जहर, उन रिश्ते नातों में।
तूने मेंहदी दोबारा, कैसे रचाई नाजुक हाथों में।
तोड़कर सात फेरों का बंधन,आ गई तू गेरो की बातों में।

माना कि तू खूबसूरत,नहीं थी।
पर तुमने ये सोच केसे लिया,हमको तुम्हारी जरूरत नहीं थी।
मुझे अश्कों में डुबोकर छोड़ गई, तन्हाई के मोड़ पर।
अब तो चलती है यादों की गाड़ी, बेवफ़ाई के रोड़ पर।
तू एक बार बता तो जरा,क्या कमी थी हमारी चाहतों में।
तूने मेंहदी दोबारा कैसे रचाई नाजुक हाथों में।
तोड़कर सात फेरों का बंधन,आ गई तू गेरो की बातों में।

बेमौत मर के भी,जिंदा हूं अब तक।
सांसे चलती रहेगी,तेरी याद है जब तक।
मेरे दिल का ये शिशा,हो गया है नाजुक।
तुमने मारा जो ईस पर,बेवफ़ाई का चाबुक।
न जाने कब निकल जाए जनाजा, क्योंकि ठहरे जो हम जिंदा लाशों में।
तूने मेंहदी दोबारा कैसे रचाई,नाजुक हाथों में।
तोड़कर सात फेरों का बंधन,आ गई तू गेरो की बांतों में।

तोड़ गई पल भर में,जन्म जन्म के रिश्ते।
चड़ गई डोली में,हंसते हंसते।
दुनियां के ताने, हमें चिर जाएंगे।
दर्द भरी जिंदगी,हम केसे जी पाएंगें।
बह गई हर खुशी हमारी,गम की इन बरसातों में।
तूने मेंहदी दोबारा कैसे रचाई,नाजुक हाथों में।
तोड़कर सात फेरों का बंधन,आ गई तू गेरो की बातों में।

Birendar Singh Athwal

पहचान

-पहचान-
कविता

तीन रंगों से बना तिरंगा,ये तिरंगा अपने वतन की है पहचान।
ईस धरती के सिने से निकले सोना, जब हल चलाता है किसान।
शहीदों के लहू से, ईस धरती का सिना रंगा है।
शहीदों की अमानत,अपना ये तिरंगा है।
गोर से देखो ईस जमीं को,कदमों के अब तक है निसान।
तीन रंगों से बना तिरंगा,ये तिरंगा अपने वतन की है पहचान।

थे कभी तो गुलामी के कांटे,अब है ये फूलों का चमन।
शहीदों की दुआ से वतन में,है आजादी का अमन।
ईस धरती मां का अंदाज है,सबसे निराला।
जपते रहो ईस जन्नत की माला।
भूखे को अन प्यासे को पानी,इस धरती का हम पर रहेगा अहसान।
तीन रंगों से बना तिरंगा,ये तिरंगा अपने वतन की है पहचान।
इस धरती के सिने से निकले सोना, जब हल चलाता है किसान।

हर घड़ी हर पल शहीदों का नाम, रखना जुबां पर।
जरा सी आंच भी आने न पाए,धरती मां पर।
कभी चलने न देना,गुलामी का चरखा।
यूहीं बरसती रहे,ये आजादी की बरखा।
झुक पाए न कभी,ये हिमत का तूफान।
तीन रंगों से बना तिरंगा,ये तिरंगा अपने वतन की है पहचान।
इस धरती के सिने से निकले सोना, जब हल चलाता है किसान।

धरती मां के आंचल में,सबका है सपना।
करो अच्छे कर्म,मेहनत का फल अपना-अपना।
मां से रूठकर,कभी नहीं करना अनशन।
सबर करे जो,मेहनत से बन जाए गुलशन।
कदर करेगा जो मिट्टी की,वही कहलाए महान।
तीन रंगों से बना तिरंगा,ये तिरंगा अपने वतन की है पहचान।
इस धरती के सिने से निकले सोना, जब हल चलाता है किसान।

देश भक्ति का जनून,कम होने न देना।
तिरंगे पे सित्म कभी होने न देना।
गुलामी दरवाजे पे,दे सके न दस्तक।
सदा ऊंचा रहे,हिदुस्तानियों का मस्तक।
अपनी ही खुशियों के लिए,हो गए थे कुर्बान।
तीन रंगों से बना तिरंगा,ये तिरंगा अपने वतन की है पहचान।
इस धरती के सिने से निकले सोना, जब हल चलाता है किसान।

अंधेरे में चलाए जो मेहनत का तीर, उजाला बन जाए हौसलों का प्रकाश।
ढूंढ़ती रह जाएगी मंजिल उसको, छु लेगा चांद -सितारे आकाश।
मेहनत ने सबकी,जिंदगी संवारी।
भारत के वासी,मेहनत के पुजारी।
कंट्रोल गुस्से को कर लेना अच्छा है, प्यार के प्यासे भारत के इंसान।
तीन रंगों से बना तिरंगा,ये तिरंगा अपने वतन की है पहचान।
इस धरती के सिने से निकले सोना, जब हल चलाता है किसान।

Birendar Singh Athwal

तिरंगा

-तिरंगा-

कविता

हरा-सफेद-केसरिया,ये तीन तिरंगे की लाईन।
शहीदों ने अपनाया इसे,सबसे प्यारा ये डिजाईन।
जान जिगर जवानी,तिरंगे पे निसारा है।
सदा यूहीं लहराता रहे,ये इंडिया का नजारा है।
करे जो कोई तिरंगे से गद्दारी,बस मोत है यारो गद्दारी का फाईन।
हरा-सफेद-केसरिया,ये तीन तिरंगे की लाईन।
शहीदों ने अपनाया इसे,सबसे प्यारा ये डिजाईन।

याद रखो गुजरे हुए कल को,घड़ी उम्मीदों की मंहगे में पाई है।
भूल न जाना भूलकर कभी,सूरत शहीदों की तिरंगे में आई है।
तिरंगा है नाम,इंडिया की पहचान का।
मोहताज नहीं ये,किसी के अहसान का।
ईस पहचान के लिए हुए कितने शहीद,कभी किए नहीं गद्दारी के साईन।
हरा-सफेद-केसरिया,ये तीन तिरंगे की लाईन।
शहीदों ने अपनाया इसे,सबसे प्यारा ये डिजाईन।

मजबूत रहे उनके,इरादे जमकर।
हंसते-हंसते झुल गए,रस्सी को धागे समझकर।
आंखों में अश्कों की,बूंद नहीं थी।
शहीदों के बिन,हमको ये नींद नहीं थी।
सपने आजादी के लाखों थे आंखों में,
नहीं थे सेवन ऐट नाईन।
हरा-सफेद-केसरिया,ये तीन तिरंगे की लाईन।
शहीदों ने अपनाया इसे,सबसे प्यारा ये डिजाईन।

अपनी होकर भी चुप थी तलवार,चुप रही मयान में।
थी लाशों की फसल,वतन के खलिहान में।
सब गुलामी की जंजीरों से,जकड़े हुए थे।
जिद आजादी की शहीद भी,पकड़े हुए थे।
आजादी के लिए धरती मां की गोद में, की अपनी जिंदगी जुवाईन।
हरा-सफेद-केसरिया,ये तीन तिरंगे की लाईन।
शहीदों ने अपनाया इसे,सबसे प्यारा ये डिजाईन।

ईस फूल से वतन में,सर पे था कांटो का ताज।
करते रहे सामना हालात का,हुए नहीं जिंदगी से नाराज़।
आखरी सांस तक लड़ते रहे,वतन के खातिर।
हिन्दू मुस्लिम को भड़काना थी, गोरों की सातिर।
ईस प्यारे वतन को करके अपने हवाले,शहीदों ने दिया जिंदगी से रिजाइन।
हरा-सफेद-केसरिया,ये तीन तिरंगे की लाईन।
शहीदों ने अपनाया इसे,सबसे प्यारा ये डिजाईन।

Birendar Singh Athwal

इल्जाम

-इल्जाम-
गजल

जा रहा हूं लेकर इल्जाम,जो तुमने दिया है।
हमने की वफ़ा,बेवफ़ाई का नाम तुमने दिया है।
प्यार के धागों में,वफ़ा की सुई पिरो न सकी।
जब जा रहे थे हम,जरा सी तू रो न सकी।
झूठा दिलासा ही सही,ये काम भी तुमने न किया है।
जा रहा हूं लेकर इल्जाम,जो तुमने दिया है।

तेरे शहर की दीवारों पे,ये इल्जाम लिख दूंगा।
तू बेकसूर, मैं खुद को बदनाम लिख दूंगा।
डर जमाने का हमको नहीं,आपने गुनहगार जो बना दिया।
विरान हुई हमरी दुनियां,दिल जख्मों का बाजार बना दिया।
बनके नागिन जहरीली, इंतकाम तुमने लिया है।
जा रहा हूं लेकर इल्जाम,जो तुमने दिया है।
हमने की वफ़ा,बेवफ़ाई का नाम तुमने दिया है।

झूठ जुबां से तेरी,कांटे बनके बरसते हैं।
एक आशिक मैं ही नहीं,न जाने कितने तड़पते हैं।
कोरा कागज समझकर,वफ़ा का मैने किया था साइन।
मिली जो हमको सजा,दिल लगाने का हमने दिया है फाइन।
चेन से जीने भी देती नहीं,जीना हराम तुमने किया है।
जा रहा हूं लेकर इल्जाम,जो तुमने दिया है।
हमने की वफ़ा,बेवफ़ाई का नाम तुमने दिया है।

सच्चे दिलदार की तौहीन,तेरे जैसी बेवफ़ा करती है।
प्यार की कदर न जाने,दिल्लगी करती है।
हमको तो डूबो गई,शराब के महखाने में।
तन्हाई दर्दे ए गमों के,तहखाने में।
लत एसी लगी, हाथों में जाम तुमने दिया है।
जा रहा हूं लेकर इल्जाम,जो तुमने दिया है।
हमने की वफ़ा,बेवफ़ाई का नाम तुमने दिया है।

Birendar Singh Athwal

अगन

– अग्न-
गजल

आपके हसीन लवों को, मैं चुंम लूं एक बार।
दिल में लगी जो अगन,इसे बुझालूं ए यार।
न पूछो हाल,हमारे जिगर का।
आशिक हुआ,ये तुम्हारे फिगर का।
जब भी देखता हूं तुझको,रोक पाऊं न मैं ये दिल ए बेकरार।
आपके हसीन लवों को, मैं चूंम लूं एक बार।

तू है खुशबू चमन की, हसीन फूलों से नखरे।
तेरे हुस्न की कली पे दीवाने हुए,मेरे दिल के भवरे।
गुनगुनाने लगा है,मन का ये साज।
पी जाऊंगा प्याला,तेरे हुस्न का में आज।
हुस्न के महखाने से छलक रहा है शवाब,जी चाहता है एक जाम लूं मैं
दिलदार।
आपके हसीन लवों को, मैं चुंम लूं एक बार।
दिल में लगी जो अगन,इसे बुझालुं ए यार

बहक जाते हैं कदम,अपने तो बेबसी में।
सजाए बैठा हूं सेज,तेरे आने की खुशी में।
करवटें बदलकर,हवाओं से करता हूं बातें।
कब आयेगी दिल की महफ़िल में, कब होगी मुलाकातें।
कोई दूजा मन को भाता नहीं,बस जुबां पे आपकी ही तकरार।
आपके हसीन लवों को, मैं चुंम लूं एक बार।
दिल में लगी जो अगन,इसे बुझा लूं ए यार।

तेरी अदाओं की बिजली,दिल पे गिरी है।
तुझे क्या पता ये जिंदगी,तन्हाइयों में केसे घिरी है।
जहां जिस तरफ भी देखूं,आए नजर तेरा ही चेहरा।
होता नहीं बर्दाश्त,टूट गया सबर का पेहरा।
इन अदाओं से नजर हटती नहीं,हर घड़ी आपका करलूं दीदार।
आपके हसीन लवों को, मैं चुंम लूं एक बार।
दिल में लगी जो अगन,इसे बुझा लूं ए यार।

मेरी चाहत में एक बार,खोकर तो देखो।
बीज मुहोब्बत का दिल में,बोकर तो देखो।
निखर जाते हैं चेहरे, इश्क़ में-अ हसीना।
रुकता नहीं रोके हुए,इश्क़ ऐसा है पसीना।
देकर देख चाहत की ये चाबी,दिल में भरलूं ये प्यार।
आपके हसीन लवों को, मैं चुंम लूं एक बार।
दिल में लगी जो अगन,इसे बुझा लूं ए यार।

जवां दिल पर छोड़ ना जाना,यादों का बादल।
जख्मी दिलों को जमाना,कहता है पागल।
कसूर दिल का होता है,प्यार पाने के लिए।
ठोकरों के हवाले न करना,जमाने के लिए।
तू कहे तो सात जन्मों तक तेरा,करलुं इंतजार।
आपके हसीन लवों को, मैं चुंम लूं एक बार।
दिल में लगी जो अगन,इसे बुझा लूं ए यार।

Birendar Singh Athwal